The daughter-in-law of a freedom fighter living in a hut.

 झोपड़ी में रह रही स्वतंत्रता सेनानी की बहू। 

The daughter-in-law of a freedom fighter living in a hut.




रायपुर के बागबाहरा के सुनसुनिया में रहता है परिवार। 


आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं तो उसके पीछे आजादी के परवानों की कुर्बानी है ऐसे ही एक स्वतंत्रता सेनानी थे हनुमान सिंह राजपूत। साल 1932 में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार के विरोध में 10 महीने कारावास की सजा हुई थी। 

विडंबना यह है कि उनका परिवार आज भी अभावों की जिंदगी जी रहा है। 
कहते तो कई योजनाएं हैं स्वतंत्रा सेनानी के परिवारों के लिए लेकिन हनुमान सिंह की बहू आज भी जो झोपड़ीनुमा घर में गुजारा कर रही है। दो पोते हैं जो दिहाड़ी मजदूरी कर जिंदगी चला रहे हैं। 


अशिक्षा के चलते पिछड़ गए। 

जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के लेखक विजय शर्मा ने अपनी किताब में 35 फ्रीडम फाइटर का उल्लेख किया है। जिनमें से एक हनुमान सिंह राजपूत भी है। शर्मा ने बताया कि 2 साल पहले जब मैं उनके गांव गया तो कुछ बता नहीं पा रहे थे। मैंने इनसे जुड़े सोर्स तलाशे और फिर उनसे मिलकर जानकारी इकट्ठा की   गरीबी और अशिक्षा के चलते इन्हें सरकारी योजनाओं की भी जानकारी नहीं है। मुश्किल से इंदिरा आवास योजना का लाभ हाल ही में मिल पाया है लेकिन पूरे परिवार का गुजारा उसमें संभव नहीं है। 



पंडित शुक्ल के साथ हुए थे गिरफ्तार। 

विदेशी वस्तुओ का विरोध करते वक्त रायपुर के कीका भाई की दुकान के सामने पिकेटिंग करते हुए पंडित रविशंकर शुक्ल, ठाकुर प्यारेलाल, यतीयतन  , लक्ष्मी लाल और आनंद दास के साथ हनुमान सिंह गिरफ्तार हुए थे। 11 दिनों तक थाने में रखकर प्रताड़ित किया गया था। न्यायालय के आदेश पर 19 फरवरी 1932 से 21 दिसंबर 1932 तक कारावास हुआ। जेल से छूटने के बाद क्षेत्र में जन जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। 


बस जिंदगी कट रही है। 

परिजनों ने बताया हमको किसी भी योजनाओं की जानकारी नहीं दी और ना ही हमने किसी को अपना दुखड़ा सुनाय
। पिता की मौत कैंसर से हो गई। घर जिम्मेदारी हम दोनों बेटों पर आ गई बस जिंदगी कट रही है। 


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